आजकल देश में हर तरफ एक उन्माद है कि अमेरिका की तरह हमें भी आतंकवाद से जंग करनी चाहिए हर कोई पाकिस्तान में हमले करके इंडिया के गुनाहगारो को मारने से कम में समझौता करने को तैयार नहीं दिखता.
भाईसाहब हमारे देश में माँ बाप का प्यार इतना ज्यादा मिलता है कि बचपना कभी जाता नहीं जो चीज दिख जाये हमें वो चाहिए यहाँ तो बच्चे माँ से चाँद दिलाने को भी बोल देते है ,माँ जब बोलती थी कि बेटा चाँद दूर है कैसे लाये तो हम कहते थे कि छत में जाके तोड़ के लाओ .आज लादेन मारा गया तो हमें भी अपने दुश्मन की याद सताने लगी उसको मारने का मन होने लगा , देश के लिए उन्माद होना बहुत अच्छी बात है लेकिन दूध के पतीले कि तरह नहीं कि उबाल आया ,और बैठ गया .
हां अपने राष्ट्र के दुश्मनों के साथ हमें ऐसा करना चाहिए किन्तु कुछ प्रश्न है :-क्या हम इसके लिए समर्थ है ,क्या हम सच में ऐसा चाहते है ,क्या हमारी सेना इतनी मजबूत है क्या कोई ऐसी संस्था है जो इस निर्णय को बिना किसी विरोध के ले सके ,क्या तथाकथित हमारे मानवाधिकारवादी इसकी सही में इजाजत देंगे ,क्या संसद और समाज इसके लिए एक मत है और सबसे जरूरी प्रश्न दुसरे देश में ऐसी कार्यवाही करने के लिए हमारा कोई कानून है ? क्योकि भाई हम लोकतंत्र वादी है .
हमारे खिलाफ ये आतंकवाद कोई ऐसा रोग नहीं है कि जो जुकाम बुखार जैसी दवाइयों से ठीक हो जायेगा .ये एक कैंसर है जो बहुत ज्यादा फैल चूका है ,झोलाछाप डॉक्टर से इसका इलाज अब नहीं होने वाला .इसकी पूरी जाच करके और योजना बनाके इसको ओपरेट करना पड़ेगा .
बचपन से हमने सुना और पढ़ा है कि बल बुध्धि विवेक और धेर्य से हम सब प्राप्त कर सकते है ,क्या हमारे देश में ये है .हा भाई सारी योग्यता है और प्रयोग कर भी रहे है ,विवेक और धेर्य का तो नहीं पता परन्तु बल और बुध्धि का प्रयोग तो हम एक दुसरे पर बहुत कर रहे है .
कोई आतंकवादी घटना जब घटती है जो हमारी जनता दुःख से भावुक हो जाती है करो या मरो का सन्देश देती है ,सत्ता धारी उचित कार्यवाही का आश्वासन देते है और विपक्षी सरकार को सत्ता से हटाने की मांग करते है ,और ये हमेसा होता है बस सत्ता और विपक्ष्य बदलता रहता है जनता वही रहती है .
परिपक्व होते लोकतान्त्रिक देश में शायद जाने कैसे एक धारणा बन गई है की कुछ करो मत बस अपनी नाकामी दुसरे के सर डाल दो अपने को शांतिपिर्य देश बता कर अपनी कमजोरी को छुपा लो .
कभी कभी मन में विचार आता है की जाने कैसे हम अपने आप को बड़ा लोकतंत्र ,विकाशशील,जिम्मेदार देश और शक्तिशाली समर्थ बताते है .शायद बाहर के देशो में ऐसा समझा जाता हो अच्छा है ,परन्तु मुझे ऐसा लगता है की हमारी गाड़ी अपने आप चल रही है और ड्राईवर सो रहा है सब भगवान भरोसे जो होगा देख लेंगे की जगह जो होगा भुगत लेंगे वाली भावना है .आलसी ,निक्कमेपन और चाटुकारिता की हद है .
साथियों अब हल्ला मचाके कुछ नहीं मिलेगा ,शांत होकर पहले अपने को हर क्षेत्र में योग्य बनाकर फिर निर्णय करने की जरूरत है ,अभी बहुत सी जमीनी हकीकत है जिन्हें हमें पहले पूरा करना है ,हमारे यहाँ कार्यवाही की बात सब करते है पर निर्णय लेने वाला कोई नहीं है और कोई लेगा भी तो सत्ता और विपक्ष्य पहले एक दुसरे पे हमला कर देंगे अरे भाई अगर इसने ऐसा किया तो उनका सरकार बनाने का सपना टूट जायेगा .
सबसे पहले हमें अपनी तुलना अमेरिया या अन्य किसी से नहीं करनी चाहिए वो क्या है वो उनका विषय है वो बहुत दूर है ,और हमारी स्थिति अगल है आतंकवाद हमारे अन्दर और बाहर दोनों और से समान रूप से फैला हुआ है .हम अपने देश में निर्णय लेने की स्थिति में ही नहीं है बाहर का क्या करेंगे हमारी जेलों में हमारे लोगो को मारने वाले ही हमारे मेहमान बने बैठे है तो दुसरो के मेहमानों का आप क्या कर लेंगे आप मार सकते नहीं अगरपकड़ के लायेंगे तो एक बंगला और बनाना पड़ेगा मेहमानों के लिए और भाई सेवा में कुछ कमी रह गई तो हमारे मानवाधिकारवादी सड़क पे लोटने लगेंगे इतना हल्ला मचायंगे की भाई न सो पावोगे न खा पाओगे .
आज जरूरत है की अपने को पहले देश के अन्दर मजबूत होकर सभीजनों को विश्वास में लेके ऐसे कानून और संस्था का निर्माण करना चाहिए जो निर्णय ले सके और उसके लिए वो संसदीय परम्परा के अनुरूप स्वतंत्र हो.