लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विचार और परिवर्तन एक अंतहीन परिकिर्या है .सभी दल कुछ लोगो के एक विचार की परिभाषा है ,जिस की विचारधारा को मेरे समान एक "आम आदमीं " का समर्थन मिलता है वो "सरकार " बन जाता है .यहाँ पर आम आदमीं वो व्यक्ति है जो लगभग किसी दल का मेम्बर नहीं होता जिसके पास इतना वक्त नहीं है की दलों की राजनीती को समझे विचारे , उसका जीवन इस विशाल और महान देश मे अपने जीवन यापन की नियुनतम आवश्यकता तो पूरा करने में ही फसा रहता है जो संविधान के अनुसार सरकार का अनिवार्य कर्त्तव्य था (है) . ये अकाट्य सत्य है की लोकतंत्र की शासन व्यवस्था सर्वोतम व्यवस्था है ,
प्रश्न ये है की आज़ादी के इतने वर्षो के बाद भी आज हम सिर्फ बहस कर रहे है दसको के बाद आज क्या देखने को मिल रहा है ,सडको पे और संसद में एक ऐसी बहस जो कम से कम मुझे नहीं लगता की किसी सकारात्मकता को दर्शा रही है ,
बड़ा दुर्भाग्य है की सभी दलों के बारे में कम से कम मेरी राय तो येही बन रही है कि स्वयं कुछ सकारात्मक शुरुवात नहीं करते है और सिर्फ इंतजार करते हैकि कोई करे और उसकी कमी निकलने में कोई कसर न छोड़ी जाये , लोकतंत्र ऐसे संकर्मण कल से गुज़र रहा है कि अगर अभी से सभी दलों दुवारा आत्ममंथ नहीं किया गया तो सबसे ज्यादा इन्ही लोगो को नुकसान होगा ,क्योकि सरकार तो तब भी रहेगी पता नहीं व्यवस्था क्या होगी y . पचास साल पहले और आज के जनमानस में जमीन असमान का फर्क है आज वो समझ सकता है और देख सकता है सुन सकता है और अँधा विस्वास नहीं कर सकता .आज आम आदमी राजनेताओं के हर व्यव्हार और अपनी परिस्थिति को समझ रहा है .और कही हद तक ये भी सच है कि लोकतंत्र विरोधी भावना मन में आने लगी है ,क्योकि परेशान और आभाव से घिरा आदमी कब तक वायदों के नारों पर विस्वास करता रहेगा ,हम आम आदमी उस सयुक्त परिवार में रहने वाले व्यक्ति कि तरह है जिसमे हर कार्य सबके हित और विकास के लिए क्या जाता है , लेकिन जब उसी परिवार में जाने अनजाने किसी की अवहेलना होने लगती है तो सबसे पहले उसका प्रभाव परिवार व्यवस्था पर ही पड़ता है .
आज ऐसा महसूस होने लगा है हमारी राजनीतिदलों की विचारधारा संकीर्ण होती जा रही है हर जनहित मुद्दे को पहले दलगत स्वार्थ से देखा जा रहा है ,सरकार पक्ष का दल हमेसा अपने कार्यकाल को लेकर शंकित रहता है और विपक्षी दल का हर प्रयास सरकार को "येन केन प्रकारेण" हर मुद्दे पे नाकारा दर्शाने का होता है .और मेरा जैसा आदमीं अपने को असहाय देखता है .हर अच्छी व्यवस्था के लिए कीमत चुकानी पड़ती है अब आम आदमीं और कितनी कीमत चुकाएगा दसको से वो चुपचाप वादों पर विस्वास कर रहा है और सायद उसके धेर्य की भी कोई तो हद होगी ,
आज के हालत एक छुपे हुए बबंडर का संकेत दे रहे है सबको धेर्य के साथ ईमानदारी से काम करना होगा ,वर्ना जो होगा वो सायद किसी के हित में नहीं होगा .क्या एक भी राजनितिक दल अपनी दल गत विचार धारा पर आत्ममंथन करने को तैयार होगा एक एक यक्ष प्रश्न है , क्योंकि "मेरा मेरा" चिल्लाने से कुछ भी "हमारा" नहीं हो सकता .
राजनेताओ को सिरे से खारिज करना या गालिया देना ये निहायती असोभानीया है परन्तु परेशान आदमी हर चीज को अपनी निगाह से ही देखता है जिस तहर का वो जीवन अपने आस पास देख रहा है उससे कब तक हम नैतिकता और शालीनता कि उम्मीद कर सकते है ,
"बहुमत" के विचार को कब तक "कुछ लोगो" का विचार कह कर हम बहस को नकारते रहेंगे .भारत देश अपने बाल्यावस्था से युवा अवस्था में प्रवेश कर रहा है ,निति निर्धारको को अब गंभीरता से सोचना होगा ,
आज हर दल को सच्चे मन से अपने विचारो का मंथन करना पड़ेगा ,खुले दिल से अपनी गलतियों को मानना पड़ेगा , केवल और केवल अपने कार्यो से जनता का दिल जीतना पड़ेगा वरना कल आने वाला समय उनको याद जरूर करेगा ये उनपर निहित है कि वो किस रूप में अपने को याद करवाना चाहते है .
आम जनता उनको ही भला बुरा कहती है क्योकि हमारे हित की कसम खा कर ही वो मंत्री बनते है .