Sunday, November 20, 2011

मन की व्यथा



अंतर मन की विस्तृत व्यथा अब इसको पार लगाऊ कैसे ,
इस जीवन के कोलाहल में शांति गीत अब गाऊ कैसे ,
जीवन निर्झर  हर पल एक भय अन्तगति को पाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत............
जो बीत गया वो व्यर्थ नहीं था लेकिन तब वह अर्थ नहीं था 
अब भूतकाल में जाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत.........
सब कहते मै व्यर्थ जिया मै कहता मै अर्थ जिया 
मेरे तेरे इस अंतर्दुंद में सत्य तत्व को पाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत-------------