Friday, April 29, 2011

हम भारत के लोग !!!!!!!!!!!

" हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
  सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा 
  उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए 
  दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद 
  द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"
कभी सोचा की इनमे कितनी बाते सब समझ सकते है ,या कभी समझने की जरूरत समझी .जिन्होंने सविधान बनाया उस देशकाल परिस्थिति वो लोग हमारे हित संरक्षयक थे 
उन्होंने देश की आने वाली पीढ़ी के हितो को ध्यान में रखते हुए ,उस वक़्त सारे भारत वासियों की ओर से ये प्रस्तावना लिखी जो की आज तक एक भारतीय की "कसम " है 
अपने देश के लिए .
परन्तु क्या आज इस कसम का नैतिक मूल्य उतना प्रासंगिक है लोगो के अंतरमन में ? आज  प्रभुत्व सम्पन्ता व्यक्तिगत ,पंथ निरपेक्षता वोट बैंक ,
  लोकतंत्रात्मक गणराज्य किताबो में रह गया है .सामाजिक न्याय अप्रासंगिक ,आर्थिक न्याय पूंजीपतियों के लिए रह गया है . विचार ओर अभिव्यक्ति का 
कोई स्थान नहीं ,विश्वास का  कोई आधार नहीं बचा धर्म और उपासना डलहोजी की निति को आज भी जिन्दा रखने की कोशिश है ,
  प्रतिष्ठा और अवसर समर्थ शक्तिशालियो के लिए लिए रह गया है ,इन सारी परिस्थितियों  में राष्ट्र की एकता अखंडता और बंधुत्व का किया होगा ये सायद अब समझाने का विषय नहीं होना चाहिए .
आज बहुत से लोग संविधान को बदलने की बात कह कर अपने को राष्ट्र का सच्चा भक्त साबित कर रहे है ,मेरा उन महान्भाओं से अनुरोध है 
कि कृपा करके एक बार सविधान को पढ़े फिर  
उसके दोष निकाले.कोई  शायद  अपने घर को गन्दा नहीं करता ,अगर गंदगी हो तो उसे साफ करता है ,गन्दा होने पर घर नहीं बदलता .
और जो घर बदलता है तो क्या जरूरी है कि फिर गन्दा नहीं करोगे .
हमारा लोकतान्त्रिक ढांचा अतुलनीय है हमारी व्यवस्तापक रूपरेखा  संतुलित है .केवल व्यवस्था करने वाले का नैतिक पतन अपनी पराकाष्टा पर है .
सोचो विचारो घर को साफ करो ,घर को तोड़ने या बदलने कि बात मत करो .

 
 

 
 

Tuesday, April 26, 2011

एक गरीब का मकान !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

बिधवा रामवती आज बड़ी खुश थी ,आज ग्राम प्रधान जी ने बुला के बतया कि तुम्हारे इन्द्रा आवास की फाइल लग गई है .बरसात से पहले अपने कच्चे मकान की मरम्मत के लिए लकडिया और फूस का इंतजाम के डर से वो सो नहीं पाती थी .जब तक रामधन जिन्दा था उसे कोई परेशानी नहीं थी मजदूरी से इतना तो मिल ही जाता था कि दो जून की रोटी आराम से खा लेते थे और तीन ही तो प्राणी थे घर में मिया बीबी और एक बेटा गिरधारी .आराम से दिन कटते थे .मजूरी कर कर के एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा भी जोड़ लिया था उस दिन जब जमीन के कागज रामधन ने रामवती के हाथो में दिए वो अपने आप को किसी जमींदार से कम नहीं समझ रही थी साडी बिरादरी में उसकी चर्चा थी .बाप दादो के समय से किसी को जमीन का सुख नहीं मिला था ,पड़ोस के मुरारी काका ने तो यहाँ तक बोल दिया कि रामधन ने तो अपने पित्तरो को ही तार  दिया  बाप दादा तो दुसरो की जमीन में ही झोपड़ी बना बना कर दिन कट दिए .अब तो जमीन वाले हो गए ,गिरधर की शादी दोनों ने बड़े धूम धाम से की गाँव के बड़े जमीन वालो को भी न्योता भेजा कुछ तो आये भी.दिन कटने लगे , बेटा अब बाहर जा के कमाना चाहने लगा गाँव में मजदूरी में अब उसे अच्छा नहीं लगता था साथ का मुरारी शहर जाके कैसा बाबु बन गया है  जब भी गाँव आता है जींस की पैंट और चश्मा पहन के .रामवती और रामधन बेटे हो मना कर रहे थे कि न जाओ गाँव में ही रहो यही कुछ कर लो पर वो कहा मानने वाला था और बीबी ने भी तो शहर के सपने देखने जो शुरू कर दिए .वो भी चला गया फिर मुडके न आया ,अशोक के मोबाइल पे दो चार बार फोन किया ,और आके घरवाली को भी साथ ले गया माँ को मानना तो आसान था ,बगल वाली काकी को रामवती ने बताया कि शहर में  गिरधर काम पे जाता है रोटी पानी बनाने कि परेशानी है इसलिए बहु साथ गई है आती रहेगी . गिरधर आता तो रहा पर मेहमानों कि तरह साल दो साल में एक बार .फिर भी दिन कटते रहे दो ही तो प्राणी थे अब .गरीब को दुख भी बहुत होते है अचानक रामधन ने बिस्तर पकड़ लिया ,बेटे को बुलावा भेजा लेकिन तेरवी तक ही पंहुचा .सबने बेटे से कहा कि अम्मा को अपने साथ लेजाओ वो तैयार भी होगया कल सुबह  निकलना था रात को बहु ने जाने क्या कहा कि सुबह रामवती गठरी लेके बैठी रही जाने कब दोनों निकल गए .फिर से वो अकेली हो गई ,

आज इतने सालो के बाद वो खुश थी ,सपने देखने लगी  लगी दो कमरों का पक्का मकान होगा सायद बहु भी आ जाये  पोते पोतियों को देख सकुंगी .
 ग्राम बिकास अधिकारी और पटवारी साहब ने आके जमीन के कागज जाचे और मेम्बर साहब के कान में कुछ बोला ,मेम्बर साहब ने रामवती को धीरे से कहा कि काकी दो हजार रूपये लगेंगे कागज पे सरकारी काम के बेचारी रामवती मुह देखने लगी उसके समझ में नहीं आया .डरते हुए पूछा कहे के दो हजार प्रधान जी तो बोले थे कि सरकार मकान के पैसे दे रही है .पटवारी जी तुनक गए बोले जाओ नहीं होगा काम .वो डर गई प्रधान जी के पास  पहुची उन्होंने भी डाट दिया तुम गरीबो को सरकारी आदमीं से बोलने का तमीज नहीं होता चलो में देखता हु ,अब सब में करवाता हु तुम बस अंगूठा लगा देना कागज पे टिक है .गरीब की उम्मीद हाँ  तो बोलना ही था .सरकारी काम फिर से शुरू हुआ काफी लोग आये कोई जमीन नाप के गया किसी ने कागजो पर अंगूठे लगाये तीन महीने बीत गए पड़ोस के शादू  का मकान तो बनने लगा था ,वो किससे पूछती  सरकारी लोग जो पड़ोस में आते बोलते कि बनेगा बनेगा .पर अब तो उम्मीद ख़तम सी होने लगी ,शाम को अचानक आज गिरधारी आया था  वो तो ख़ुशी के मरे सब भूल गई गिरधर  उसके लिए दो साडिया भी लेके आया था मारे खुशी के रामवती का ठिकाना नहीं था .बेटे ने बताया  कि अब वो अच्छा कमाता है और उसके नाम पोस्ट ऑफिस में खाता खोलने आया है जिससे कि वो गाँव में उसे शहर से पैसे भेजेगा एक कागज पे अंगूठा लगा के पोस्टमास्टर से मिलने को बोल के उसी वक़्त बाहर चला गया .पूरी रात वो खाना बना के इंतजार करती रही पर वो न आया .कुछ दिन के बाद वो प्रधान जी से मकान का पूछने गई तो उनके तो तेवर बदले हुए थे गुस्से में बोले तुम गरीबो का दिमाक ख़राब  है क्या जमीन  बेच कर  अब कहा मकान बनाना है , रामवती सन्न रह गई बाबु जी जमीन कहा बिकी ,किसने बेचीं मेरी जमीन क्या कह रहे है आप .आपने मेरे साथ धोखा किया है .वो बड बडाती हुई निचे बैठ गई .प्रधान जी चिल्ला रहे थे खुद कि "अपने लड़के को भेज कर जमीन का सौदा करवा के मुझ पर इल्जाम लगाने चले है इनके भले का सोचना भी गुनाह है अरे हमारी ईमानदारी और दयालुता का  कोई मोल नहीं कि जमीन अपनी होते हुए भी हमने कहा चलो जब तक बुडिया जिन्दी है उसे वही रहने दो .अब तो हद हो गई शाम को जमीन पे ट्रेक्टर चलवाता हू."
रामवती कहा सुनने वाली थी उसे तो इश्वर ने अपने पास बुला लिया था शायद वहा उसे मकान मिल जाये .





Sunday, April 24, 2011

नेता गिरी भारत का फलता फूलता व्यवसाय!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

एक व्यक्ति महाराष्ट्र सेआता है ,और अचानक ऐसा लगता है की भारत की राजनीति सामाजिक  विचार धारा के बीच तलवारे खीच गई .राजनीतिक पार्टियों में भी साफ दो गुट बनते हुए दिखाई देने लगे .एक गुट अपने को सबसे इमानदार बताने लग गया और एक गुट पुरातत्व विभाग की तरह कई प्रकार के सबूत पेस करने लगा ,यहाँ तक हद होगी कि अपने को दलाल तक बोलने लगे .कभी कभी बड़ा मन ख़राब होता है कि ये कैसे नेता है हम ही तो चुन कर इन्हें मंत्री बनाते है .वाह! कितना आसान है ना नेता बनना .किसी नेता का साथ पकड़ो छोटा मोटा ठेका लेलो ,कुछ दलाली करलो  पैसा बनाओ . फिर जहा से अपने सुरु किया वैसे कुछ लोगो को अपने साथ मिलाओ और एक समूह बनाओ ,लो भैया आप नेता जी बनने के काबिल हो गए  जो आपके साथ है वो चाह कर भी आपका साथ नहीं छोड़ेंगे क्योकि भाई सबकी फसी पड़ी  है ना इसलिए .चलो जी अब  देखो हर मामले में टांग डालना सुरु करो यहाँ गलत सही कोई नहीं जानता सिर्फ हल्ला मचाओ जितना जिसका हल्ला उसकी उतनी पकड़ फिर देखना पार्टियों के दलाल आपसे मोल भाव करने आपके दरवाजे पर हाथ जोड़ कर खड़े मिलेंगे भाई साहब जरा दिमाग खोल कर निर्णय लेना क्योकि ये मौका बार बार नहीं आयेगा कोई और ना हाथ मार ले .अब सामाजिक सेवा के कार्य भी सुरु कर दो .अगल बगल देखो किसी जमींदार ने किसी गरीब की जमीन दबा रखी हो आवाज उठाओ भाई अरे अरे रुको गरीब की ओर से कहा बोलने लगे वो क्या देगा यार ,उसे तो ईश्वर ने गरीब बनाया है भूल कर भी भगवान के कार्य में दखलंदाजी मत करो अमीर आदमी का साथ दो  वो नेता बनने का खर्च भी तो उठाएगा समझे .अब इलाके के कुछ ऐसे महान लोगो के कार्यो में सहायता करो जो पहले से किसी की संपत्ति हडपने ,अवैध कार्य करने के कारण प्रशासन के द्वारा परेशान किये जा रहे है (भाई ये तो अच्छे लोग  है जिन्हें पता नहीं क्यों लोग बुरा भला कहते है शायद खुद नहीं कर पाते इस लिए चिड़ते है आप अपना काम करे बस  ) अब भैया  कही भी कोई काम हो रहा हो  तो वहा जाकर उसकी बुराई करे कमिया निकाले तभी तो लोग आपपर ध्यान देंगे  ,अगल बगल में देखे किसके जरूरी काम रुके पड़े है उनसे मिले उनके काम अपने इस्तर पर कराये (अब तक तो आप काफी अधिकारियो के चहेते तो बन ही गए होंगे भाई उनकी भी तो जरूरते होती है ना ) भाई  काम बहुत मिलता है किसी बिधवा की पेंसन रुकी होती है ,किसी का इन्द्रा आवास ,किसी का बिजली का कनेक्सन ,बैंक लोन जमीन का मामला दुकान का मामला दहेज़ के केस वगैरा वगैरा पर भाई  ध्यान रखा सुविधा शुल्क की बात पहले कर लेना क्योकि भैया फ्री में काम करोगे लो लोग फालतू समझेंगे देखना कोई काम करवाने नहीं आयेगा .अब देखना लोगो का काम भी होगा आपका नाम भी ओर आपकी जेब में माल भी .अब कौन  साला आपको नेता बनने से रोक सकता है .जब भी चुनाव होंगे पार्टी वाले आपको खुद ढूढने आएंगे .आपको पार्टी अपने झंडे के नीचे चुनाव लड़ाएगी और भाई  समाज में काम तो आपने किये  ही है वो लोग आपको जीता तो देंगे ही .भाई जीत गए तो एक और बात का ख्याल रखना पाच साल तक किसी का कोई काम मत करना सिर्फ माल कमाना काम करने के लिए हारे हुए लोग बहुत होंगे  भाई लोकतंत्र है  सबको मौका मिलना चाहिए .कमाओगे  नहीं तो अगला चुनाव कैसे लड़ोगे समझे .आराम से बैमानी करते हुए खूब कमाओ औरो को भी कमाने दो फसने का कोई डर दिल में मत रखना अकेले तो हो नहीं ऊपर वाले बन्दे देख लेंगे आखिर हिस्सा तो वहा भी देते हो ना .