Wednesday, December 28, 2011

राजनैतिक विचार ----एक आम आदमीं की नजर मे.

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विचार और परिवर्तन एक अंतहीन परिकिर्या है .सभी दल कुछ लोगो के एक विचार की परिभाषा है ,जिस की विचारधारा  को मेरे समान एक "आम आदमीं " का समर्थन मिलता है वो "सरकार " बन जाता है .यहाँ पर आम आदमीं वो व्यक्ति है जो लगभग किसी दल का मेम्बर नहीं होता जिसके पास इतना वक्त नहीं है की दलों की राजनीती को समझे विचारे , उसका जीवन इस विशाल और महान देश मे अपने जीवन यापन की नियुनतम आवश्यकता तो पूरा करने में ही फसा रहता है जो    संविधान के अनुसार सरकार का अनिवार्य कर्त्तव्य था (है) . ये अकाट्य सत्य है की लोकतंत्र की  शासन व्यवस्था सर्वोतम व्यवस्था है ,
प्रश्न ये है की आज़ादी के इतने वर्षो के बाद भी आज हम सिर्फ बहस कर रहे है दसको के बाद आज क्या देखने को मिल रहा है ,सडको पे और संसद में  एक ऐसी बहस जो कम से कम मुझे नहीं लगता की किसी सकारात्मकता को दर्शा रही है ,
बड़ा दुर्भाग्य है की सभी दलों के बारे में कम से कम मेरी राय तो येही बन रही है कि स्वयं कुछ  सकारात्मक शुरुवात नहीं करते है और सिर्फ इंतजार करते हैकि  कोई करे और उसकी कमी निकलने में कोई कसर न छोड़ी जाये , लोकतंत्र ऐसे संकर्मण कल से गुज़र रहा है कि अगर अभी से सभी दलों दुवारा आत्ममंथ नहीं किया गया तो सबसे ज्यादा इन्ही लोगो को नुकसान होगा ,क्योकि सरकार तो तब भी रहेगी पता नहीं व्यवस्था क्या होगी y . पचास साल पहले और आज के जनमानस में जमीन असमान का फर्क है आज वो  समझ सकता है और देख सकता है सुन सकता है और अँधा विस्वास नहीं कर सकता .आज आम आदमी राजनेताओं के हर व्यव्हार और अपनी परिस्थिति को समझ रहा है .और कही हद तक ये भी सच है कि लोकतंत्र विरोधी भावना मन में आने लगी है ,क्योकि परेशान और आभाव से घिरा आदमी कब तक वायदों के नारों पर विस्वास करता रहेगा ,हम आम आदमी उस सयुक्त परिवार में रहने वाले व्यक्ति कि तरह है जिसमे हर कार्य सबके हित और विकास के लिए क्या जाता है , लेकिन जब उसी परिवार में जाने अनजाने किसी की अवहेलना होने लगती है तो सबसे पहले उसका प्रभाव परिवार व्यवस्था पर ही पड़ता है .
आज ऐसा महसूस होने लगा है  हमारी राजनीतिदलों की   विचारधारा संकीर्ण होती जा रही है हर जनहित मुद्दे को पहले दलगत स्वार्थ से देखा जा रहा है ,सरकार पक्ष का दल हमेसा अपने कार्यकाल को लेकर शंकित रहता है और विपक्षी दल का हर प्रयास सरकार को "येन केन प्रकारेण" हर मुद्दे पे नाकारा दर्शाने का होता है .और मेरा जैसा आदमीं अपने को असहाय देखता है .हर अच्छी व्यवस्था के लिए कीमत चुकानी पड़ती है अब आम आदमीं और कितनी कीमत चुकाएगा दसको से वो चुपचाप वादों पर विस्वास कर रहा है और सायद उसके धेर्य की भी कोई तो हद होगी ,
आज के हालत एक छुपे हुए बबंडर का संकेत  दे रहे है सबको धेर्य के साथ ईमानदारी से काम करना होगा ,वर्ना जो होगा वो सायद किसी के हित में नहीं होगा .क्या एक भी राजनितिक दल अपनी दल गत विचार धारा पर आत्ममंथन करने को तैयार होगा एक एक यक्ष प्रश्न है , क्योंकि "मेरा मेरा" चिल्लाने से कुछ भी "हमारा" नहीं हो सकता .
राजनेताओ को सिरे से खारिज करना या गालिया देना ये निहायती असोभानीया है परन्तु परेशान आदमी हर चीज को अपनी निगाह से ही देखता है जिस तहर का वो जीवन अपने आस पास देख रहा है उससे कब तक हम नैतिकता और शालीनता कि उम्मीद कर सकते है ,
"बहुमत" के विचार को कब तक "कुछ लोगो" का  विचार कह कर हम बहस को नकारते रहेंगे .भारत देश अपने बाल्यावस्था से युवा अवस्था में प्रवेश कर रहा है ,निति निर्धारको को अब गंभीरता से सोचना होगा ,


आज हर दल को सच्चे मन से अपने विचारो का मंथन करना पड़ेगा ,खुले दिल से अपनी गलतियों को मानना पड़ेगा , केवल और केवल अपने कार्यो से जनता का दिल जीतना पड़ेगा वरना कल आने वाला समय उनको याद जरूर करेगा ये उनपर निहित है कि वो किस रूप में अपने को याद करवाना चाहते है .
आम जनता उनको ही भला बुरा कहती है क्योकि हमारे  हित की कसम खा कर ही वो मंत्री बनते है .

Sunday, November 20, 2011

मन की व्यथा



अंतर मन की विस्तृत व्यथा अब इसको पार लगाऊ कैसे ,
इस जीवन के कोलाहल में शांति गीत अब गाऊ कैसे ,
जीवन निर्झर  हर पल एक भय अन्तगति को पाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत............
जो बीत गया वो व्यर्थ नहीं था लेकिन तब वह अर्थ नहीं था 
अब भूतकाल में जाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत.........
सब कहते मै व्यर्थ जिया मै कहता मै अर्थ जिया 
मेरे तेरे इस अंतर्दुंद में सत्य तत्व को पाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत-------------


Saturday, October 1, 2011

एक अरब अमीरों का देश

भाई गजब सा हो रिया  आज कल ,हर कोई बलदा हुआ नजर आ रिया  .कल मुगेरी बाबु को रिक्शे वाले ने डाट दिया , गलती से मार्केट तक चलने से बोल बैठे थे रिक्शे वाला भड़क गया बोला चलो निकल लो ३२ रुपए कमा चुका हु अब मै गरीब नहीं हु चले आते है जाने कहा से और देखते भी नहीं किसको रिक्शा चलाने को बोल दिया .

भला हो सरकार की  प्लानिंग कमिशन का २१ करोड़ तो पहले से ही अमीर थे ,अब सब अमीर है दिल्ली मे भीख मांगने वाले सरकार को फूल का गुलदस्ता देके धन्यवाद् करेंगे कि गरीबो को रोटी न दी तो क्या हुआ अमीरी का ताज 
तो दे दिया .

विश्व में सायद हमारा देश एकलोता देश है यहाँ  रोटी कपडा मकान भले न हो लेकिन भाई यहाँ अमीर हर कोई है .
हमारा पैमाना अलग है भाई इन्सान जिन्दा हो चलता हुआ कही भी पाया जाये वो अमीर है ,कल हमने सोचा भाई हम तो अमीर है चलो कुछ दान कर ले एक भिखारी को देखा पाच रूपये देने लगे तो भैया उसने मना कर दिया बोला ३२ रूपये का इन्तेजाम हो गया अब हम अमीर है लंच के बाद आपसे कुछ ले पाएंगे तब तक इंतज़ार करो ,लो भैया हम तो शर्मिंदा होगये विस्वास नहीं हुआ कि "ये मेरा इंडिया ".


Sunday, May 8, 2011

आतंक के खिलाफ क्या हम समर्थ है ?

आजकल देश में हर तरफ एक उन्माद है कि अमेरिका की तरह हमें भी आतंकवाद से जंग करनी चाहिए हर कोई पाकिस्तान में हमले करके इंडिया के गुनाहगारो को मारने से कम में समझौता करने को तैयार नहीं दिखता.
भाईसाहब  हमारे देश में माँ बाप का प्यार इतना ज्यादा मिलता है कि बचपना कभी जाता नहीं जो चीज दिख जाये हमें वो चाहिए यहाँ तो बच्चे माँ  से चाँद दिलाने को भी बोल देते है ,माँ जब बोलती थी कि बेटा चाँद दूर है कैसे लाये तो हम कहते थे कि छत में जाके तोड़ के लाओ .आज  लादेन मारा गया तो  हमें भी अपने दुश्मन की याद सताने लगी उसको मारने का मन होने लगा , देश के लिए उन्माद होना बहुत अच्छी बात है लेकिन दूध के पतीले कि तरह नहीं कि उबाल आया ,और बैठ गया .

हां अपने राष्ट्र के दुश्मनों के साथ हमें ऐसा करना चाहिए किन्तु कुछ प्रश्न है :-क्या हम इसके लिए समर्थ है ,क्या हम सच में ऐसा चाहते है ,क्या हमारी सेना इतनी मजबूत है क्या कोई ऐसी संस्था है जो  इस निर्णय को बिना किसी विरोध के ले सके ,क्या तथाकथित हमारे मानवाधिकारवादी इसकी सही में इजाजत देंगे ,क्या संसद और समाज इसके लिए एक मत है और सबसे जरूरी प्रश्न  दुसरे देश में ऐसी कार्यवाही करने के लिए हमारा कोई कानून है ? क्योकि भाई हम लोकतंत्र वादी है .
हमारे खिलाफ ये आतंकवाद कोई ऐसा रोग नहीं है कि जो जुकाम बुखार जैसी दवाइयों से ठीक  हो जायेगा .ये एक कैंसर है जो बहुत ज्यादा फैल चूका है ,झोलाछाप डॉक्टर से इसका इलाज अब नहीं होने वाला .इसकी पूरी जाच करके और योजना बनाके इसको ओपरेट करना पड़ेगा .
बचपन से हमने सुना और पढ़ा है कि बल बुध्धि विवेक और धेर्य से हम सब प्राप्त कर सकते है ,क्या हमारे देश में ये है .हा भाई  सारी योग्यता है और प्रयोग कर भी रहे है ,विवेक और धेर्य का तो नहीं पता परन्तु बल और बुध्धि का प्रयोग तो हम एक दुसरे पर बहुत कर रहे है .

कोई आतंकवादी घटना जब घटती है जो हमारी जनता दुःख से भावुक हो जाती है करो या मरो का सन्देश देती है ,सत्ता धारी उचित कार्यवाही का आश्वासन देते है और विपक्षी सरकार  को सत्ता से हटाने की मांग करते है ,और ये हमेसा होता है बस सत्ता और विपक्ष्य बदलता रहता है जनता वही रहती  है .
परिपक्व होते लोकतान्त्रिक देश में शायद    जाने कैसे एक धारणा बन गई है की कुछ करो मत बस अपनी नाकामी दुसरे के सर डाल दो अपने को शांतिपिर्य देश बता कर अपनी कमजोरी को छुपा लो .
कभी कभी मन में विचार आता है की जाने कैसे हम अपने आप को बड़ा लोकतंत्र  ,विकाशशील,जिम्मेदार देश और शक्तिशाली समर्थ बताते है .शायद बाहर के देशो में ऐसा समझा जाता हो अच्छा है ,परन्तु मुझे ऐसा लगता है की हमारी गाड़ी अपने आप  चल रही है और ड्राईवर सो रहा है सब भगवान भरोसे जो होगा देख लेंगे की जगह  जो होगा भुगत लेंगे वाली भावना है .आलसी ,निक्कमेपन और चाटुकारिता की हद है .

साथियों अब हल्ला मचाके कुछ नहीं मिलेगा ,शांत होकर पहले अपने को  हर क्षेत्र में  योग्य बनाकर फिर निर्णय करने की जरूरत है ,अभी बहुत सी जमीनी हकीकत है जिन्हें हमें पहले पूरा करना है ,हमारे यहाँ कार्यवाही की बात सब करते है पर निर्णय लेने वाला कोई नहीं है और कोई लेगा भी तो सत्ता और विपक्ष्य पहले एक दुसरे पे हमला कर देंगे अरे भाई अगर इसने ऐसा  किया तो उनका सरकार बनाने का सपना टूट जायेगा .

सबसे पहले हमें अपनी तुलना अमेरिया या अन्य किसी से नहीं करनी चाहिए वो क्या है वो उनका विषय है वो बहुत दूर है ,और हमारी स्थिति अगल है आतंकवाद हमारे अन्दर और बाहर दोनों और से समान रूप से फैला हुआ है .हम अपने देश में निर्णय लेने की स्थिति में ही नहीं है बाहर का क्या करेंगे हमारी  जेलों में हमारे लोगो को मारने वाले ही हमारे मेहमान बने बैठे है तो दुसरो के मेहमानों का आप क्या कर लेंगे आप  मार सकते नहीं अगरपकड़ के लायेंगे तो एक बंगला और बनाना पड़ेगा मेहमानों के लिए और भाई सेवा में कुछ कमी रह गई तो हमारे मानवाधिकारवादी सड़क पे  लोटने लगेंगे इतना हल्ला मचायंगे की भाई न सो पावोगे न खा पाओगे .


आज जरूरत है की अपने को पहले देश के अन्दर मजबूत होकर सभीजनों  को विश्वास में लेके ऐसे कानून और संस्था का निर्माण करना चाहिए जो निर्णय ले सके और उसके लिए वो संसदीय परम्परा के अनुरूप स्वतंत्र हो.




Wednesday, May 4, 2011

कीमत क्या है !!!!!!!!!!!

लादेन मारा गया आतंकवाद से सहमती न रखने वाले सभी लोगो ने इसका स्वागत किया .
इंडिया के मीडिया को गरारे करने पड़े खबर को देते देते गले थक गए हमारे कुछ नेता तो 
अंतिम क्रिया का तरीका भी बताने लगे .कैसे मरा  कैसे मारा ऐसे बता रहे थे कि C I A ने 
इनके पैर पर सर रखकर आशीर्वाद लिया हो और इन्होने विजयी भव कह कर भेजा हो .
अपने नाखून साफ नहीं कर सकते दुसरे का सर धोने चले है .
अमेरिका ने अपने इस ऑपरेशन से सिर्फ और सिर्फ ये जता दिया कि उसके देश में एक आम 
आदमी की कीमत है .वो इन्सान को पैसे में नहीं गिनता ,पैसे को इन्सान के लिए गिनता है  
उसके   लिए वो कुछ भी कर सकता  है .कुछ बाते गलत भी है पर वो करता तो है ,
लादेन को मरने के कुछ घंटो के बाद भारत के तमाम मीडिया में राजनेता और नौकरशाह 
संसद से लेकर मुंबई हमलो के गुनाहगारो को पकड़ने मरने की बाते पानी पि पि कर गाने लगे 
हद है भाई अरे कोई इनको बताता क्यों नहीं आप अपनी जबान बंद रख कर कुछ कर भी सकते 
हो या नहीं ,अमेरिका ने उसे भी  नहीं बताया जिसके वहा वो छुपा था ,
ये तो ऐसे  लगता है की कोई करना ही नहीं चाहते और कोई सोच ले तो इतना हल्ला पहले मचा देते है बंदा पहले ही गायब .
खिसिया कर एक बात बोल देते है कि हम अमेरिका कि तरह नहीं कर सकते हम उतने पॉवर फुल नहीं है ,अमेरिका ने मना किया है क्या पॉवर फुल बनने से .अरे जितना ये लोग  इंडिया का पैसा 
दबा के बैठे है उतने में तो दो अमेरिका पल जायेंगे .
इनके लिए ये ही काफी है कि ये बोलते रहे मुफ्त के रायचंद बने रहे सब को राय देते रहे .और कभी 
किसी ने कुछ पूछ लिया तो कह देंगे हम अमेरिका कि तरह पॉवर फुल नहीं है.
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अमेरिका ने एक बात को सिद्ध किया कि अपनों के दिल में अपनों का दर्द होता है ,वो अपने देश के बराबर अपने नागरिक कि कीमत मानता है ,हमारा दुर्भाग्य  ही है कि किसको अपना कहे .

 

Friday, April 29, 2011

हम भारत के लोग !!!!!!!!!!!

" हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :
  सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा 
  उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए 
  दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद 
  द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"
कभी सोचा की इनमे कितनी बाते सब समझ सकते है ,या कभी समझने की जरूरत समझी .जिन्होंने सविधान बनाया उस देशकाल परिस्थिति वो लोग हमारे हित संरक्षयक थे 
उन्होंने देश की आने वाली पीढ़ी के हितो को ध्यान में रखते हुए ,उस वक़्त सारे भारत वासियों की ओर से ये प्रस्तावना लिखी जो की आज तक एक भारतीय की "कसम " है 
अपने देश के लिए .
परन्तु क्या आज इस कसम का नैतिक मूल्य उतना प्रासंगिक है लोगो के अंतरमन में ? आज  प्रभुत्व सम्पन्ता व्यक्तिगत ,पंथ निरपेक्षता वोट बैंक ,
  लोकतंत्रात्मक गणराज्य किताबो में रह गया है .सामाजिक न्याय अप्रासंगिक ,आर्थिक न्याय पूंजीपतियों के लिए रह गया है . विचार ओर अभिव्यक्ति का 
कोई स्थान नहीं ,विश्वास का  कोई आधार नहीं बचा धर्म और उपासना डलहोजी की निति को आज भी जिन्दा रखने की कोशिश है ,
  प्रतिष्ठा और अवसर समर्थ शक्तिशालियो के लिए लिए रह गया है ,इन सारी परिस्थितियों  में राष्ट्र की एकता अखंडता और बंधुत्व का किया होगा ये सायद अब समझाने का विषय नहीं होना चाहिए .
आज बहुत से लोग संविधान को बदलने की बात कह कर अपने को राष्ट्र का सच्चा भक्त साबित कर रहे है ,मेरा उन महान्भाओं से अनुरोध है 
कि कृपा करके एक बार सविधान को पढ़े फिर  
उसके दोष निकाले.कोई  शायद  अपने घर को गन्दा नहीं करता ,अगर गंदगी हो तो उसे साफ करता है ,गन्दा होने पर घर नहीं बदलता .
और जो घर बदलता है तो क्या जरूरी है कि फिर गन्दा नहीं करोगे .
हमारा लोकतान्त्रिक ढांचा अतुलनीय है हमारी व्यवस्तापक रूपरेखा  संतुलित है .केवल व्यवस्था करने वाले का नैतिक पतन अपनी पराकाष्टा पर है .
सोचो विचारो घर को साफ करो ,घर को तोड़ने या बदलने कि बात मत करो .

 
 

 
 

Tuesday, April 26, 2011

एक गरीब का मकान !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

बिधवा रामवती आज बड़ी खुश थी ,आज ग्राम प्रधान जी ने बुला के बतया कि तुम्हारे इन्द्रा आवास की फाइल लग गई है .बरसात से पहले अपने कच्चे मकान की मरम्मत के लिए लकडिया और फूस का इंतजाम के डर से वो सो नहीं पाती थी .जब तक रामधन जिन्दा था उसे कोई परेशानी नहीं थी मजदूरी से इतना तो मिल ही जाता था कि दो जून की रोटी आराम से खा लेते थे और तीन ही तो प्राणी थे घर में मिया बीबी और एक बेटा गिरधारी .आराम से दिन कटते थे .मजूरी कर कर के एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा भी जोड़ लिया था उस दिन जब जमीन के कागज रामधन ने रामवती के हाथो में दिए वो अपने आप को किसी जमींदार से कम नहीं समझ रही थी साडी बिरादरी में उसकी चर्चा थी .बाप दादो के समय से किसी को जमीन का सुख नहीं मिला था ,पड़ोस के मुरारी काका ने तो यहाँ तक बोल दिया कि रामधन ने तो अपने पित्तरो को ही तार  दिया  बाप दादा तो दुसरो की जमीन में ही झोपड़ी बना बना कर दिन कट दिए .अब तो जमीन वाले हो गए ,गिरधर की शादी दोनों ने बड़े धूम धाम से की गाँव के बड़े जमीन वालो को भी न्योता भेजा कुछ तो आये भी.दिन कटने लगे , बेटा अब बाहर जा के कमाना चाहने लगा गाँव में मजदूरी में अब उसे अच्छा नहीं लगता था साथ का मुरारी शहर जाके कैसा बाबु बन गया है  जब भी गाँव आता है जींस की पैंट और चश्मा पहन के .रामवती और रामधन बेटे हो मना कर रहे थे कि न जाओ गाँव में ही रहो यही कुछ कर लो पर वो कहा मानने वाला था और बीबी ने भी तो शहर के सपने देखने जो शुरू कर दिए .वो भी चला गया फिर मुडके न आया ,अशोक के मोबाइल पे दो चार बार फोन किया ,और आके घरवाली को भी साथ ले गया माँ को मानना तो आसान था ,बगल वाली काकी को रामवती ने बताया कि शहर में  गिरधर काम पे जाता है रोटी पानी बनाने कि परेशानी है इसलिए बहु साथ गई है आती रहेगी . गिरधर आता तो रहा पर मेहमानों कि तरह साल दो साल में एक बार .फिर भी दिन कटते रहे दो ही तो प्राणी थे अब .गरीब को दुख भी बहुत होते है अचानक रामधन ने बिस्तर पकड़ लिया ,बेटे को बुलावा भेजा लेकिन तेरवी तक ही पंहुचा .सबने बेटे से कहा कि अम्मा को अपने साथ लेजाओ वो तैयार भी होगया कल सुबह  निकलना था रात को बहु ने जाने क्या कहा कि सुबह रामवती गठरी लेके बैठी रही जाने कब दोनों निकल गए .फिर से वो अकेली हो गई ,

आज इतने सालो के बाद वो खुश थी ,सपने देखने लगी  लगी दो कमरों का पक्का मकान होगा सायद बहु भी आ जाये  पोते पोतियों को देख सकुंगी .
 ग्राम बिकास अधिकारी और पटवारी साहब ने आके जमीन के कागज जाचे और मेम्बर साहब के कान में कुछ बोला ,मेम्बर साहब ने रामवती को धीरे से कहा कि काकी दो हजार रूपये लगेंगे कागज पे सरकारी काम के बेचारी रामवती मुह देखने लगी उसके समझ में नहीं आया .डरते हुए पूछा कहे के दो हजार प्रधान जी तो बोले थे कि सरकार मकान के पैसे दे रही है .पटवारी जी तुनक गए बोले जाओ नहीं होगा काम .वो डर गई प्रधान जी के पास  पहुची उन्होंने भी डाट दिया तुम गरीबो को सरकारी आदमीं से बोलने का तमीज नहीं होता चलो में देखता हु ,अब सब में करवाता हु तुम बस अंगूठा लगा देना कागज पे टिक है .गरीब की उम्मीद हाँ  तो बोलना ही था .सरकारी काम फिर से शुरू हुआ काफी लोग आये कोई जमीन नाप के गया किसी ने कागजो पर अंगूठे लगाये तीन महीने बीत गए पड़ोस के शादू  का मकान तो बनने लगा था ,वो किससे पूछती  सरकारी लोग जो पड़ोस में आते बोलते कि बनेगा बनेगा .पर अब तो उम्मीद ख़तम सी होने लगी ,शाम को अचानक आज गिरधारी आया था  वो तो ख़ुशी के मरे सब भूल गई गिरधर  उसके लिए दो साडिया भी लेके आया था मारे खुशी के रामवती का ठिकाना नहीं था .बेटे ने बताया  कि अब वो अच्छा कमाता है और उसके नाम पोस्ट ऑफिस में खाता खोलने आया है जिससे कि वो गाँव में उसे शहर से पैसे भेजेगा एक कागज पे अंगूठा लगा के पोस्टमास्टर से मिलने को बोल के उसी वक़्त बाहर चला गया .पूरी रात वो खाना बना के इंतजार करती रही पर वो न आया .कुछ दिन के बाद वो प्रधान जी से मकान का पूछने गई तो उनके तो तेवर बदले हुए थे गुस्से में बोले तुम गरीबो का दिमाक ख़राब  है क्या जमीन  बेच कर  अब कहा मकान बनाना है , रामवती सन्न रह गई बाबु जी जमीन कहा बिकी ,किसने बेचीं मेरी जमीन क्या कह रहे है आप .आपने मेरे साथ धोखा किया है .वो बड बडाती हुई निचे बैठ गई .प्रधान जी चिल्ला रहे थे खुद कि "अपने लड़के को भेज कर जमीन का सौदा करवा के मुझ पर इल्जाम लगाने चले है इनके भले का सोचना भी गुनाह है अरे हमारी ईमानदारी और दयालुता का  कोई मोल नहीं कि जमीन अपनी होते हुए भी हमने कहा चलो जब तक बुडिया जिन्दी है उसे वही रहने दो .अब तो हद हो गई शाम को जमीन पे ट्रेक्टर चलवाता हू."
रामवती कहा सुनने वाली थी उसे तो इश्वर ने अपने पास बुला लिया था शायद वहा उसे मकान मिल जाये .





Sunday, April 24, 2011

नेता गिरी भारत का फलता फूलता व्यवसाय!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

एक व्यक्ति महाराष्ट्र सेआता है ,और अचानक ऐसा लगता है की भारत की राजनीति सामाजिक  विचार धारा के बीच तलवारे खीच गई .राजनीतिक पार्टियों में भी साफ दो गुट बनते हुए दिखाई देने लगे .एक गुट अपने को सबसे इमानदार बताने लग गया और एक गुट पुरातत्व विभाग की तरह कई प्रकार के सबूत पेस करने लगा ,यहाँ तक हद होगी कि अपने को दलाल तक बोलने लगे .कभी कभी बड़ा मन ख़राब होता है कि ये कैसे नेता है हम ही तो चुन कर इन्हें मंत्री बनाते है .वाह! कितना आसान है ना नेता बनना .किसी नेता का साथ पकड़ो छोटा मोटा ठेका लेलो ,कुछ दलाली करलो  पैसा बनाओ . फिर जहा से अपने सुरु किया वैसे कुछ लोगो को अपने साथ मिलाओ और एक समूह बनाओ ,लो भैया आप नेता जी बनने के काबिल हो गए  जो आपके साथ है वो चाह कर भी आपका साथ नहीं छोड़ेंगे क्योकि भाई सबकी फसी पड़ी  है ना इसलिए .चलो जी अब  देखो हर मामले में टांग डालना सुरु करो यहाँ गलत सही कोई नहीं जानता सिर्फ हल्ला मचाओ जितना जिसका हल्ला उसकी उतनी पकड़ फिर देखना पार्टियों के दलाल आपसे मोल भाव करने आपके दरवाजे पर हाथ जोड़ कर खड़े मिलेंगे भाई साहब जरा दिमाग खोल कर निर्णय लेना क्योकि ये मौका बार बार नहीं आयेगा कोई और ना हाथ मार ले .अब सामाजिक सेवा के कार्य भी सुरु कर दो .अगल बगल देखो किसी जमींदार ने किसी गरीब की जमीन दबा रखी हो आवाज उठाओ भाई अरे अरे रुको गरीब की ओर से कहा बोलने लगे वो क्या देगा यार ,उसे तो ईश्वर ने गरीब बनाया है भूल कर भी भगवान के कार्य में दखलंदाजी मत करो अमीर आदमी का साथ दो  वो नेता बनने का खर्च भी तो उठाएगा समझे .अब इलाके के कुछ ऐसे महान लोगो के कार्यो में सहायता करो जो पहले से किसी की संपत्ति हडपने ,अवैध कार्य करने के कारण प्रशासन के द्वारा परेशान किये जा रहे है (भाई ये तो अच्छे लोग  है जिन्हें पता नहीं क्यों लोग बुरा भला कहते है शायद खुद नहीं कर पाते इस लिए चिड़ते है आप अपना काम करे बस  ) अब भैया  कही भी कोई काम हो रहा हो  तो वहा जाकर उसकी बुराई करे कमिया निकाले तभी तो लोग आपपर ध्यान देंगे  ,अगल बगल में देखे किसके जरूरी काम रुके पड़े है उनसे मिले उनके काम अपने इस्तर पर कराये (अब तक तो आप काफी अधिकारियो के चहेते तो बन ही गए होंगे भाई उनकी भी तो जरूरते होती है ना ) भाई  काम बहुत मिलता है किसी बिधवा की पेंसन रुकी होती है ,किसी का इन्द्रा आवास ,किसी का बिजली का कनेक्सन ,बैंक लोन जमीन का मामला दुकान का मामला दहेज़ के केस वगैरा वगैरा पर भाई  ध्यान रखा सुविधा शुल्क की बात पहले कर लेना क्योकि भैया फ्री में काम करोगे लो लोग फालतू समझेंगे देखना कोई काम करवाने नहीं आयेगा .अब देखना लोगो का काम भी होगा आपका नाम भी ओर आपकी जेब में माल भी .अब कौन  साला आपको नेता बनने से रोक सकता है .जब भी चुनाव होंगे पार्टी वाले आपको खुद ढूढने आएंगे .आपको पार्टी अपने झंडे के नीचे चुनाव लड़ाएगी और भाई  समाज में काम तो आपने किये  ही है वो लोग आपको जीता तो देंगे ही .भाई जीत गए तो एक और बात का ख्याल रखना पाच साल तक किसी का कोई काम मत करना सिर्फ माल कमाना काम करने के लिए हारे हुए लोग बहुत होंगे  भाई लोकतंत्र है  सबको मौका मिलना चाहिए .कमाओगे  नहीं तो अगला चुनाव कैसे लड़ोगे समझे .आराम से बैमानी करते हुए खूब कमाओ औरो को भी कमाने दो फसने का कोई डर दिल में मत रखना अकेले तो हो नहीं ऊपर वाले बन्दे देख लेंगे आखिर हिस्सा तो वहा भी देते हो ना .