Tuesday, April 26, 2011

एक गरीब का मकान !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

बिधवा रामवती आज बड़ी खुश थी ,आज ग्राम प्रधान जी ने बुला के बतया कि तुम्हारे इन्द्रा आवास की फाइल लग गई है .बरसात से पहले अपने कच्चे मकान की मरम्मत के लिए लकडिया और फूस का इंतजाम के डर से वो सो नहीं पाती थी .जब तक रामधन जिन्दा था उसे कोई परेशानी नहीं थी मजदूरी से इतना तो मिल ही जाता था कि दो जून की रोटी आराम से खा लेते थे और तीन ही तो प्राणी थे घर में मिया बीबी और एक बेटा गिरधारी .आराम से दिन कटते थे .मजूरी कर कर के एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा भी जोड़ लिया था उस दिन जब जमीन के कागज रामधन ने रामवती के हाथो में दिए वो अपने आप को किसी जमींदार से कम नहीं समझ रही थी साडी बिरादरी में उसकी चर्चा थी .बाप दादो के समय से किसी को जमीन का सुख नहीं मिला था ,पड़ोस के मुरारी काका ने तो यहाँ तक बोल दिया कि रामधन ने तो अपने पित्तरो को ही तार  दिया  बाप दादा तो दुसरो की जमीन में ही झोपड़ी बना बना कर दिन कट दिए .अब तो जमीन वाले हो गए ,गिरधर की शादी दोनों ने बड़े धूम धाम से की गाँव के बड़े जमीन वालो को भी न्योता भेजा कुछ तो आये भी.दिन कटने लगे , बेटा अब बाहर जा के कमाना चाहने लगा गाँव में मजदूरी में अब उसे अच्छा नहीं लगता था साथ का मुरारी शहर जाके कैसा बाबु बन गया है  जब भी गाँव आता है जींस की पैंट और चश्मा पहन के .रामवती और रामधन बेटे हो मना कर रहे थे कि न जाओ गाँव में ही रहो यही कुछ कर लो पर वो कहा मानने वाला था और बीबी ने भी तो शहर के सपने देखने जो शुरू कर दिए .वो भी चला गया फिर मुडके न आया ,अशोक के मोबाइल पे दो चार बार फोन किया ,और आके घरवाली को भी साथ ले गया माँ को मानना तो आसान था ,बगल वाली काकी को रामवती ने बताया कि शहर में  गिरधर काम पे जाता है रोटी पानी बनाने कि परेशानी है इसलिए बहु साथ गई है आती रहेगी . गिरधर आता तो रहा पर मेहमानों कि तरह साल दो साल में एक बार .फिर भी दिन कटते रहे दो ही तो प्राणी थे अब .गरीब को दुख भी बहुत होते है अचानक रामधन ने बिस्तर पकड़ लिया ,बेटे को बुलावा भेजा लेकिन तेरवी तक ही पंहुचा .सबने बेटे से कहा कि अम्मा को अपने साथ लेजाओ वो तैयार भी होगया कल सुबह  निकलना था रात को बहु ने जाने क्या कहा कि सुबह रामवती गठरी लेके बैठी रही जाने कब दोनों निकल गए .फिर से वो अकेली हो गई ,

आज इतने सालो के बाद वो खुश थी ,सपने देखने लगी  लगी दो कमरों का पक्का मकान होगा सायद बहु भी आ जाये  पोते पोतियों को देख सकुंगी .
 ग्राम बिकास अधिकारी और पटवारी साहब ने आके जमीन के कागज जाचे और मेम्बर साहब के कान में कुछ बोला ,मेम्बर साहब ने रामवती को धीरे से कहा कि काकी दो हजार रूपये लगेंगे कागज पे सरकारी काम के बेचारी रामवती मुह देखने लगी उसके समझ में नहीं आया .डरते हुए पूछा कहे के दो हजार प्रधान जी तो बोले थे कि सरकार मकान के पैसे दे रही है .पटवारी जी तुनक गए बोले जाओ नहीं होगा काम .वो डर गई प्रधान जी के पास  पहुची उन्होंने भी डाट दिया तुम गरीबो को सरकारी आदमीं से बोलने का तमीज नहीं होता चलो में देखता हु ,अब सब में करवाता हु तुम बस अंगूठा लगा देना कागज पे टिक है .गरीब की उम्मीद हाँ  तो बोलना ही था .सरकारी काम फिर से शुरू हुआ काफी लोग आये कोई जमीन नाप के गया किसी ने कागजो पर अंगूठे लगाये तीन महीने बीत गए पड़ोस के शादू  का मकान तो बनने लगा था ,वो किससे पूछती  सरकारी लोग जो पड़ोस में आते बोलते कि बनेगा बनेगा .पर अब तो उम्मीद ख़तम सी होने लगी ,शाम को अचानक आज गिरधारी आया था  वो तो ख़ुशी के मरे सब भूल गई गिरधर  उसके लिए दो साडिया भी लेके आया था मारे खुशी के रामवती का ठिकाना नहीं था .बेटे ने बताया  कि अब वो अच्छा कमाता है और उसके नाम पोस्ट ऑफिस में खाता खोलने आया है जिससे कि वो गाँव में उसे शहर से पैसे भेजेगा एक कागज पे अंगूठा लगा के पोस्टमास्टर से मिलने को बोल के उसी वक़्त बाहर चला गया .पूरी रात वो खाना बना के इंतजार करती रही पर वो न आया .कुछ दिन के बाद वो प्रधान जी से मकान का पूछने गई तो उनके तो तेवर बदले हुए थे गुस्से में बोले तुम गरीबो का दिमाक ख़राब  है क्या जमीन  बेच कर  अब कहा मकान बनाना है , रामवती सन्न रह गई बाबु जी जमीन कहा बिकी ,किसने बेचीं मेरी जमीन क्या कह रहे है आप .आपने मेरे साथ धोखा किया है .वो बड बडाती हुई निचे बैठ गई .प्रधान जी चिल्ला रहे थे खुद कि "अपने लड़के को भेज कर जमीन का सौदा करवा के मुझ पर इल्जाम लगाने चले है इनके भले का सोचना भी गुनाह है अरे हमारी ईमानदारी और दयालुता का  कोई मोल नहीं कि जमीन अपनी होते हुए भी हमने कहा चलो जब तक बुडिया जिन्दी है उसे वही रहने दो .अब तो हद हो गई शाम को जमीन पे ट्रेक्टर चलवाता हू."
रामवती कहा सुनने वाली थी उसे तो इश्वर ने अपने पास बुला लिया था शायद वहा उसे मकान मिल जाये .





3 comments:

  1. Mujhe lagta hai ki gram pradhan kuch imaandaar tha tabhi to wo usne sirf 2000 ka demand kiya. These days now in bihar mukhiya demads 10000 to sanctione one Indra Awas. Called it Shushashan.

    Ab waqt aa gaya ki hame uthna chahiye. Ab phir ek kranti ki zarurat hai nahi to roz aisa hi hota rahega.

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  2. haan sir ye sach hain hota hai aaj bhi

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  3. यह करप्शन का एक रूप है बहुत गहरा

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