भारतीय सामाजिक उत्थान ----------------------------------------
-------------------------------------------------------------------------------------------------------
-------------------------------------------------------------------------------------------------------
-------------------------------------------------------------------------------------------------------
-------------------------------------------------------------------------------------------------------
आज
कल देश में एक बहस चल रही है की यहाँ धर्म के नाम पर की सब कुछ होता है वो
चाहे राजनेतिक हो सामाजिक हो या आर्थिक हो।सभी पार्टिया अपने अपने
सामाजिक समर्थन या ये कहे की सामाजिक राजनेतिक गुलामी के माध्यम से अपने
को सिद्ध करने का भरपूर जोर लगा रही है
परन्तु मेरा विचार है की
ये पार्टी विशेष की बात नहीं है सामाजिक ताना बाना इसी तरह से विकसित है।
जिनको दोयम दर्जे का माना जाता है या ये कहे की ये तथाकथित उच्च समाज या
निम्न समाज में एक तरह से स्वयं स्वीकार्य भावना है। इसके पीछे भी
तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक कारण ही उत्तरदाई रहे होंगे। ।धर्म बेफेजूल
बदनाम रहा। आज आर्थिक और सामाजिक दोनों ही अपना रूप स्वतः की अपना रूप बदल
रहे है और ये अब चाहे न चाहे सबको मंजूर हो रहे है क्योकि येही सच्चाई है
आज कोई भी धार्मिक ,राजनेतिक आर्थिक कार्य किसी एक पर निर्भर नहीं है ,नियम
तत्कालीन समर्थवान के द्वारा ही बनाये जाते थे और उसे मान्यता देने के
लिए धार्मिक रंग दिया जाता था और वही परम्परा बन जाता था ,बहुत लोग
धार्मिक ग्रंथों का और प्रचलित कथाओं का इसके पक्ष
विपक्ष में उदहारण भी देते है और उसमे से बहुत बड़ी संख्या उन लोगो की है
जिन्होंने इनका स्वयम अध्यन ,मनन करने का या तत्कालीन देशकाल को समझने का
कभी प्रयास भी किया हो। …।मुझे व्यक्तिगत पीड़ा होती है जब कोई आज के समाज
की कुरूतियों के लिए सनातन पौराणिक काव्य ग्रंथों को अनाप सनाप बकते है
पहले भले ही कुछ लोगो ने सामाजिक उत्थान के लिए शुरुवात की ये उनके लिए
तत्कालीन आसान नहीं रहा होगा परन्तु वो प्रयास मील का पत्थर जरूर बना
भारतीय समाज आज उससे कई शताब्दियों दूर निकल आया है आज धर्म उससे निकल रहा
है,गलत परम्पराएँ स्वयं की कमजोर पद रही है या समाप्त भी हो गई है परन्तु
परम्पराएँ इतनी आसानी से नहीं जाती और अगर इसका बलात समर्थन या विरोध किया
जायेगा तो ये बिघटन करी होगा और जो हावी हो गया और फिर से उसकी
पुर्नाविर्ती ही होगी ,
पहले सामाजिक उत्थान को महत्त्व देने वाले
कुछ लोगो या राजनीती पार्टियों द्वारा राजनेतिक फायदा उठाने की गरज से दिल
से या दीमाक से प्रयास किया उसका समाज में एक सार्थक प्रभाव भी पड़ा ,उसमे
कितना सच्चे मायने में सामाजिक न्याय का उदेश्य था एक बहस का मुद्दा हो
सकता है। …परन्तु ये अकाट्य सत्य है की जब तक हम स्वयं अपने को हीनता से
नहीं निकलते तब तक किसी का सहारा कम नहीं करेगा ,,
आज के युग में
भारतीय समाज में दोनो में इससे बाहर निकलने की सुगबुगाहट होने लगी है ,में
आशावाद पर पूर्ण निष्ठा रखता हु ,और परिवर्तन दिख भी रहा है ,,,,,,,,हमें
सिर्फ अपने समाज को बदलना है ,सामाजिक आर्थिक न्याय के लिए बिना इस सोच के
साथ की न "मै हीन " ना "मै उच्च " …।इसके अलावा कोई विकल्प मुझे प्रभावी
नहीं लगता। …एक और बात धर्म की चिंता छोड़ दीजिये वो ख़त्म नहीं होता
,अपना स्थान स्वयं बना देता है। …धर्म को सहारे की जरूरत नहीं ,आप अपने
पैरों में खड़े हो जाइये
परन्तु मेरा विचार है की ये पार्टी विशेष की बात नहीं है सामाजिक ताना बाना इसी तरह से विकसित है। जिनको दोयम दर्जे का माना जाता है या ये कहे की ये तथाकथित उच्च समाज या निम्न समाज में एक तरह से स्वयं स्वीकार्य भावना है। इसके पीछे भी तत्कालीन सामाजिक और आर्थिक कारण ही उत्तरदाई रहे होंगे। ।धर्म बेफेजूल बदनाम रहा। आज आर्थिक और सामाजिक दोनों ही अपना रूप स्वतः की अपना रूप बदल रहे है और ये अब चाहे न चाहे सबको मंजूर हो रहे है क्योकि येही सच्चाई है आज कोई भी धार्मिक ,राजनेतिक आर्थिक कार्य किसी एक पर निर्भर नहीं है ,नियम तत्कालीन समर्थवान के द्वारा ही बनाये जाते थे और उसे मान्यता देने के लिए धार्मिक रंग दिया जाता था और वही परम्परा बन जाता था ,बहुत लोग धार्मिक ग्रंथों का और प्रचलित कथाओं का इसके पक्ष विपक्ष में उदहारण भी देते है और उसमे से बहुत बड़ी संख्या उन लोगो की है जिन्होंने इनका स्वयम अध्यन ,मनन करने का या तत्कालीन देशकाल को समझने का कभी प्रयास भी किया हो। …।मुझे व्यक्तिगत पीड़ा होती है जब कोई आज के समाज की कुरूतियों के लिए सनातन पौराणिक काव्य ग्रंथों को अनाप सनाप बकते है
पहले भले ही कुछ लोगो ने सामाजिक उत्थान के लिए शुरुवात की ये उनके लिए तत्कालीन आसान नहीं रहा होगा परन्तु वो प्रयास मील का पत्थर जरूर बना भारतीय समाज आज उससे कई शताब्दियों दूर निकल आया है आज धर्म उससे निकल रहा है,गलत परम्पराएँ स्वयं की कमजोर पद रही है या समाप्त भी हो गई है परन्तु परम्पराएँ इतनी आसानी से नहीं जाती और अगर इसका बलात समर्थन या विरोध किया जायेगा तो ये बिघटन करी होगा और जो हावी हो गया और फिर से उसकी पुर्नाविर्ती ही होगी ,
पहले सामाजिक उत्थान को महत्त्व देने वाले कुछ लोगो या राजनीती पार्टियों द्वारा राजनेतिक फायदा उठाने की गरज से दिल से या दीमाक से प्रयास किया उसका समाज में एक सार्थक प्रभाव भी पड़ा ,उसमे कितना सच्चे मायने में सामाजिक न्याय का उदेश्य था एक बहस का मुद्दा हो सकता है। …परन्तु ये अकाट्य सत्य है की जब तक हम स्वयं अपने को हीनता से नहीं निकलते तब तक किसी का सहारा कम नहीं करेगा ,,
आज के युग में भारतीय समाज में दोनो में इससे बाहर निकलने की सुगबुगाहट होने लगी है ,में आशावाद पर पूर्ण निष्ठा रखता हु ,और परिवर्तन दिख भी रहा है ,,,,,,,,हमें सिर्फ अपने समाज को बदलना है ,सामाजिक आर्थिक न्याय के लिए बिना इस सोच के साथ की न "मै हीन " ना "मै उच्च " …।इसके अलावा कोई विकल्प मुझे प्रभावी नहीं लगता। …एक और बात धर्म की चिंता छोड़ दीजिये वो ख़त्म नहीं होता ,अपना स्थान स्वयं बना देता है। …धर्म को सहारे की जरूरत नहीं ,आप अपने पैरों में खड़े हो जाइये