Sunday, January 6, 2013

"सुनो भारत के लोकतंत्र "

"सुनो भारत के लोकतंत्र " जनता और अपने बीच की लम्बी खाई के उस पार तुम सुन सकते हो तो सुनो तुम भारत के लोकतंत्र नहीं हो सकते , संसद के अन्दर वातानुकूलित कक्ष में बैठे हुए तथाकथित जनता के नेताओ शायद तुम हमारे प्रतिनिधि नहीं हो सकते  अरे तुम हो कौन जरा देखो मै (भारत का आम नागरिक )मर रहा हु , मै वो  ही  हु  जिसका बर्बरता से बलात्कार कर हत्या कर दी गई , तुम एक "दामिनी " से डर गए  पर मै  तेरे निज़ाम में हर तरफ हू  हर रोज़ जाने कितनो के साथ ये अन्याय होता है और तुम कानून की दुहाहिया देते नहीं थकते  ,तुम वो ही हो ना  जो बरसात में टपकते हुए  मेरे घर आकर  टूटी हुई चारपाई में बैठ कर एक सूखी  रोटी खा कर आलीशान संसद में जा बैठे हो , कभी दुबारा आ के देखा ,सुनो अब तो छत नहीं है और मेरा परिवार बेसब्री से तेरा इंतजार कर रहा है ,.अरे तुम कहते  हो न कि  तुम हमारे बीच से ही हो , माफ़ करना मेरे आसपास तुम जैसा अब कोई नहीं है , 

हा पहले शायद कुछ लोग थे जो मेरे जैसे थे जो मुझे समझते है पर वो पुरानी बाते है , सुनो अच्छा  है की अब सुधर जाओ , हमें कानून न सिखाओ अरे मुझे कोई जरूरत नहीं पुलिस से मिलने की ,कोई इच्छा भी नहीं है न्यायालयों में भीड़ बढ़ाने की ,तुम आपकी व्यवस्था  को सुधारो ,शायद तुम अपना काम भूल गए हो , मै अपने जीवन की आपाधापी में ही फसा पड़ा हू  मेरे पास अब और वक़्त नहीं की मै रोज़ आपको समझाने "इंडिया गेट " आऊ ,अब शायद मै आया तो तुम वह नहीं होगे ,तुम कहते हो न कि तुम मेरा दर्द समझते हो मेरे ही बीच हो ,तो चलो अब अगली बार मुझे मेरे भारत देश  की दुर्दशा देखने के लिए मत बुलाना , बड़ा बुरा लगता है सच में ,कोई ख़ुशी नहीं होती अपने लिए अपने ही देश में इंसाफ मागते हुए  चलो ज्याद क्या बोलू  समझ तो तुम गए होगे अब तुम सोचो ,

हां  एक और बात  तुम मेरे घर फिर जरूर आना  रोटी खाने कोशिश करूँगा की अब के वो सूखी न हो  और में भी जरूर आऊंगा दिल्ली  लाल किले में शान से फहराते हुए अपने झंडे को देखने .

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