जरा इधर भारत वर्ष में देखो तो। ……………
आकाश को मुह कर थूक रहे है कोई जमीन पे थूक उसपे लोट रहे है
जनता अबकी शायद जागी लगी है , नेताओ की नीद भागी लगी है
कुछ खा के चारा पगुराएँ फिरें है ,कोई हमहै के भरम में भरमायें फिरें है
कोई नमो नमो इतराएँ फिरें है ,कोई बाल हठी दिखलायें फिरें है
कोई पापा से पीठ थपथपाएं फिरें है ,कोई चाचू को मस्का लगायें फिरें है
कोई माया को बहिन बनायें फिरें है कोई चौदह कोस चलायें फिरें है
कोई जेल से बाहर आयें फिरें है कोई जाके डेरा जमायें फिरें है
कुछ गाँधी को अपना बताएं फिरें है ,कुछ नेहरु को ज्यादा गलियाए फिरें है कुछ पटेल लोहे का बनाये फिरें है , कोई भगत की पिस्तौल दिखाए फिरें है
कोई गाएं फिरे है कोई गुनगुनाएं फिरें है वन्दे मातरम सा सुनाएँ फिरें है। …
कुछ सच्चे सच्चाई छुपायें फिरें है नग्गे नग्गापन दिखाएँ फिरें है
सब अपने कैलेंडर लगायें फिरें है तारीख़ पे तारीख़ बताएं फिरें है
वो सन दो हज़ार अटकाएं फिरें है ये चौरासी को अब तक न भुनाएं सके है
हम जनता की भी थोड़ी लेलो बलैयाँ जो मंदिर मस्जिद में खिसियाएं पड़े है
गीता कुरान घर सजाएँ फिरें है बस जिल्दो पे नज़रे फिराएं पड़े है
पढके समझना कैसे हो भैया सदियों से अंगूठा लगाये फिरें है
अल्लाह दुहाई , राम करें अब भलाई यहाँ तो शैतान भी शरमाएँ फिरें है
लगता है कुछ तो भरमायें फिरें है ,अब "जनता " के दिन" फिरें ही फिरें" है
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