Saturday, October 5, 2013

हे पार्थ पहले तो तुम इकले पगले थे रॆऎऎऎए !!!!!!!!!! ……………





जरा इधर भारत वर्ष में देखो तो। ……………



आकाश को मुह कर थूक रहे है कोई जमीन पे थूक उसपे लोट रहे है
जनता अबकी शायद जागी लगी है , नेताओ की नीद भागी लगी है
कुछ खा के चारा पगुराएँ फिरें है ,कोई हमहै के भरम में भरमायें फिरें है
कोई नमो नमो इतराएँ फिरें है ,कोई बाल हठी दिखलायें फिरें है
कोई पापा से पीठ थपथपाएं फिरें है ,कोई चाचू को मस्का लगायें फिरें है
कोई माया को बहिन बनायें फिरें है कोई चौदह कोस चलायें फिरें है
कोई जेल से बाहर आयें फिरें है कोई जाके डेरा जमायें फिरें है
कुछ गाँधी को अपना बताएं फिरें है ,कुछ नेहरु को ज्यादा गलियाए फिरें है कुछ पटेल लोहे का बनाये फिरें है , कोई भगत की पिस्तौल दिखाए फिरें है 

कोई गाएं फिरे है कोई गुनगुनाएं फिरें है वन्दे मातरम सा सुनाएँ फिरें है। …
कुछ सच्चे सच्चाई छुपायें फिरें है नग्गे नग्गापन दिखाएँ फिरें है
सब अपने कैलेंडर लगायें फिरें है तारीख़ पे तारीख़ बताएं फिरें है
वो सन दो हज़ार अटकाएं फिरें है ये चौरासी को अब तक न भुनाएं सके है
हम जनता की भी थोड़ी लेलो बलैयाँ जो मंदिर मस्जिद में खिसियाएं पड़े है
गीता कुरान घर सजाएँ फिरें है बस जिल्दो पे नज़रे फिराएं पड़े है
पढके समझना कैसे हो भैया सदियों से अंगूठा लगाये फिरें है
अल्लाह दुहाई , राम करें अब भलाई यहाँ तो शैतान भी शरमाएँ फिरें है
 

लगता है कुछ तो भरमायें फिरें है ,अब "जनता " के दिन" फिरें ही फिरें" है

Sunday, January 6, 2013

"सुनो भारत के लोकतंत्र "

"सुनो भारत के लोकतंत्र " जनता और अपने बीच की लम्बी खाई के उस पार तुम सुन सकते हो तो सुनो तुम भारत के लोकतंत्र नहीं हो सकते , संसद के अन्दर वातानुकूलित कक्ष में बैठे हुए तथाकथित जनता के नेताओ शायद तुम हमारे प्रतिनिधि नहीं हो सकते  अरे तुम हो कौन जरा देखो मै (भारत का आम नागरिक )मर रहा हु , मै वो  ही  हु  जिसका बर्बरता से बलात्कार कर हत्या कर दी गई , तुम एक "दामिनी " से डर गए  पर मै  तेरे निज़ाम में हर तरफ हू  हर रोज़ जाने कितनो के साथ ये अन्याय होता है और तुम कानून की दुहाहिया देते नहीं थकते  ,तुम वो ही हो ना  जो बरसात में टपकते हुए  मेरे घर आकर  टूटी हुई चारपाई में बैठ कर एक सूखी  रोटी खा कर आलीशान संसद में जा बैठे हो , कभी दुबारा आ के देखा ,सुनो अब तो छत नहीं है और मेरा परिवार बेसब्री से तेरा इंतजार कर रहा है ,.अरे तुम कहते  हो न कि  तुम हमारे बीच से ही हो , माफ़ करना मेरे आसपास तुम जैसा अब कोई नहीं है , 

हा पहले शायद कुछ लोग थे जो मेरे जैसे थे जो मुझे समझते है पर वो पुरानी बाते है , सुनो अच्छा  है की अब सुधर जाओ , हमें कानून न सिखाओ अरे मुझे कोई जरूरत नहीं पुलिस से मिलने की ,कोई इच्छा भी नहीं है न्यायालयों में भीड़ बढ़ाने की ,तुम आपकी व्यवस्था  को सुधारो ,शायद तुम अपना काम भूल गए हो , मै अपने जीवन की आपाधापी में ही फसा पड़ा हू  मेरे पास अब और वक़्त नहीं की मै रोज़ आपको समझाने "इंडिया गेट " आऊ ,अब शायद मै आया तो तुम वह नहीं होगे ,तुम कहते हो न कि तुम मेरा दर्द समझते हो मेरे ही बीच हो ,तो चलो अब अगली बार मुझे मेरे भारत देश  की दुर्दशा देखने के लिए मत बुलाना , बड़ा बुरा लगता है सच में ,कोई ख़ुशी नहीं होती अपने लिए अपने ही देश में इंसाफ मागते हुए  चलो ज्याद क्या बोलू  समझ तो तुम गए होगे अब तुम सोचो ,

हां  एक और बात  तुम मेरे घर फिर जरूर आना  रोटी खाने कोशिश करूँगा की अब के वो सूखी न हो  और में भी जरूर आऊंगा दिल्ली  लाल किले में शान से फहराते हुए अपने झंडे को देखने .

Wednesday, December 28, 2011

राजनैतिक विचार ----एक आम आदमीं की नजर मे.

लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विचार और परिवर्तन एक अंतहीन परिकिर्या है .सभी दल कुछ लोगो के एक विचार की परिभाषा है ,जिस की विचारधारा  को मेरे समान एक "आम आदमीं " का समर्थन मिलता है वो "सरकार " बन जाता है .यहाँ पर आम आदमीं वो व्यक्ति है जो लगभग किसी दल का मेम्बर नहीं होता जिसके पास इतना वक्त नहीं है की दलों की राजनीती को समझे विचारे , उसका जीवन इस विशाल और महान देश मे अपने जीवन यापन की नियुनतम आवश्यकता तो पूरा करने में ही फसा रहता है जो    संविधान के अनुसार सरकार का अनिवार्य कर्त्तव्य था (है) . ये अकाट्य सत्य है की लोकतंत्र की  शासन व्यवस्था सर्वोतम व्यवस्था है ,
प्रश्न ये है की आज़ादी के इतने वर्षो के बाद भी आज हम सिर्फ बहस कर रहे है दसको के बाद आज क्या देखने को मिल रहा है ,सडको पे और संसद में  एक ऐसी बहस जो कम से कम मुझे नहीं लगता की किसी सकारात्मकता को दर्शा रही है ,
बड़ा दुर्भाग्य है की सभी दलों के बारे में कम से कम मेरी राय तो येही बन रही है कि स्वयं कुछ  सकारात्मक शुरुवात नहीं करते है और सिर्फ इंतजार करते हैकि  कोई करे और उसकी कमी निकलने में कोई कसर न छोड़ी जाये , लोकतंत्र ऐसे संकर्मण कल से गुज़र रहा है कि अगर अभी से सभी दलों दुवारा आत्ममंथ नहीं किया गया तो सबसे ज्यादा इन्ही लोगो को नुकसान होगा ,क्योकि सरकार तो तब भी रहेगी पता नहीं व्यवस्था क्या होगी y . पचास साल पहले और आज के जनमानस में जमीन असमान का फर्क है आज वो  समझ सकता है और देख सकता है सुन सकता है और अँधा विस्वास नहीं कर सकता .आज आम आदमी राजनेताओं के हर व्यव्हार और अपनी परिस्थिति को समझ रहा है .और कही हद तक ये भी सच है कि लोकतंत्र विरोधी भावना मन में आने लगी है ,क्योकि परेशान और आभाव से घिरा आदमी कब तक वायदों के नारों पर विस्वास करता रहेगा ,हम आम आदमी उस सयुक्त परिवार में रहने वाले व्यक्ति कि तरह है जिसमे हर कार्य सबके हित और विकास के लिए क्या जाता है , लेकिन जब उसी परिवार में जाने अनजाने किसी की अवहेलना होने लगती है तो सबसे पहले उसका प्रभाव परिवार व्यवस्था पर ही पड़ता है .
आज ऐसा महसूस होने लगा है  हमारी राजनीतिदलों की   विचारधारा संकीर्ण होती जा रही है हर जनहित मुद्दे को पहले दलगत स्वार्थ से देखा जा रहा है ,सरकार पक्ष का दल हमेसा अपने कार्यकाल को लेकर शंकित रहता है और विपक्षी दल का हर प्रयास सरकार को "येन केन प्रकारेण" हर मुद्दे पे नाकारा दर्शाने का होता है .और मेरा जैसा आदमीं अपने को असहाय देखता है .हर अच्छी व्यवस्था के लिए कीमत चुकानी पड़ती है अब आम आदमीं और कितनी कीमत चुकाएगा दसको से वो चुपचाप वादों पर विस्वास कर रहा है और सायद उसके धेर्य की भी कोई तो हद होगी ,
आज के हालत एक छुपे हुए बबंडर का संकेत  दे रहे है सबको धेर्य के साथ ईमानदारी से काम करना होगा ,वर्ना जो होगा वो सायद किसी के हित में नहीं होगा .क्या एक भी राजनितिक दल अपनी दल गत विचार धारा पर आत्ममंथन करने को तैयार होगा एक एक यक्ष प्रश्न है , क्योंकि "मेरा मेरा" चिल्लाने से कुछ भी "हमारा" नहीं हो सकता .
राजनेताओ को सिरे से खारिज करना या गालिया देना ये निहायती असोभानीया है परन्तु परेशान आदमी हर चीज को अपनी निगाह से ही देखता है जिस तहर का वो जीवन अपने आस पास देख रहा है उससे कब तक हम नैतिकता और शालीनता कि उम्मीद कर सकते है ,
"बहुमत" के विचार को कब तक "कुछ लोगो" का  विचार कह कर हम बहस को नकारते रहेंगे .भारत देश अपने बाल्यावस्था से युवा अवस्था में प्रवेश कर रहा है ,निति निर्धारको को अब गंभीरता से सोचना होगा ,


आज हर दल को सच्चे मन से अपने विचारो का मंथन करना पड़ेगा ,खुले दिल से अपनी गलतियों को मानना पड़ेगा , केवल और केवल अपने कार्यो से जनता का दिल जीतना पड़ेगा वरना कल आने वाला समय उनको याद जरूर करेगा ये उनपर निहित है कि वो किस रूप में अपने को याद करवाना चाहते है .
आम जनता उनको ही भला बुरा कहती है क्योकि हमारे  हित की कसम खा कर ही वो मंत्री बनते है .

Sunday, November 20, 2011

मन की व्यथा



अंतर मन की विस्तृत व्यथा अब इसको पार लगाऊ कैसे ,
इस जीवन के कोलाहल में शांति गीत अब गाऊ कैसे ,
जीवन निर्झर  हर पल एक भय अन्तगति को पाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत............
जो बीत गया वो व्यर्थ नहीं था लेकिन तब वह अर्थ नहीं था 
अब भूतकाल में जाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत.........
सब कहते मै व्यर्थ जिया मै कहता मै अर्थ जिया 
मेरे तेरे इस अंतर्दुंद में सत्य तत्व को पाऊ कैसे 
अंतर मन की विस्तृत-------------


Saturday, October 1, 2011

एक अरब अमीरों का देश

भाई गजब सा हो रिया  आज कल ,हर कोई बलदा हुआ नजर आ रिया  .कल मुगेरी बाबु को रिक्शे वाले ने डाट दिया , गलती से मार्केट तक चलने से बोल बैठे थे रिक्शे वाला भड़क गया बोला चलो निकल लो ३२ रुपए कमा चुका हु अब मै गरीब नहीं हु चले आते है जाने कहा से और देखते भी नहीं किसको रिक्शा चलाने को बोल दिया .

भला हो सरकार की  प्लानिंग कमिशन का २१ करोड़ तो पहले से ही अमीर थे ,अब सब अमीर है दिल्ली मे भीख मांगने वाले सरकार को फूल का गुलदस्ता देके धन्यवाद् करेंगे कि गरीबो को रोटी न दी तो क्या हुआ अमीरी का ताज 
तो दे दिया .

विश्व में सायद हमारा देश एकलोता देश है यहाँ  रोटी कपडा मकान भले न हो लेकिन भाई यहाँ अमीर हर कोई है .
हमारा पैमाना अलग है भाई इन्सान जिन्दा हो चलता हुआ कही भी पाया जाये वो अमीर है ,कल हमने सोचा भाई हम तो अमीर है चलो कुछ दान कर ले एक भिखारी को देखा पाच रूपये देने लगे तो भैया उसने मना कर दिया बोला ३२ रूपये का इन्तेजाम हो गया अब हम अमीर है लंच के बाद आपसे कुछ ले पाएंगे तब तक इंतज़ार करो ,लो भैया हम तो शर्मिंदा होगये विस्वास नहीं हुआ कि "ये मेरा इंडिया ".


Sunday, May 8, 2011

आतंक के खिलाफ क्या हम समर्थ है ?

आजकल देश में हर तरफ एक उन्माद है कि अमेरिका की तरह हमें भी आतंकवाद से जंग करनी चाहिए हर कोई पाकिस्तान में हमले करके इंडिया के गुनाहगारो को मारने से कम में समझौता करने को तैयार नहीं दिखता.
भाईसाहब  हमारे देश में माँ बाप का प्यार इतना ज्यादा मिलता है कि बचपना कभी जाता नहीं जो चीज दिख जाये हमें वो चाहिए यहाँ तो बच्चे माँ  से चाँद दिलाने को भी बोल देते है ,माँ जब बोलती थी कि बेटा चाँद दूर है कैसे लाये तो हम कहते थे कि छत में जाके तोड़ के लाओ .आज  लादेन मारा गया तो  हमें भी अपने दुश्मन की याद सताने लगी उसको मारने का मन होने लगा , देश के लिए उन्माद होना बहुत अच्छी बात है लेकिन दूध के पतीले कि तरह नहीं कि उबाल आया ,और बैठ गया .

हां अपने राष्ट्र के दुश्मनों के साथ हमें ऐसा करना चाहिए किन्तु कुछ प्रश्न है :-क्या हम इसके लिए समर्थ है ,क्या हम सच में ऐसा चाहते है ,क्या हमारी सेना इतनी मजबूत है क्या कोई ऐसी संस्था है जो  इस निर्णय को बिना किसी विरोध के ले सके ,क्या तथाकथित हमारे मानवाधिकारवादी इसकी सही में इजाजत देंगे ,क्या संसद और समाज इसके लिए एक मत है और सबसे जरूरी प्रश्न  दुसरे देश में ऐसी कार्यवाही करने के लिए हमारा कोई कानून है ? क्योकि भाई हम लोकतंत्र वादी है .
हमारे खिलाफ ये आतंकवाद कोई ऐसा रोग नहीं है कि जो जुकाम बुखार जैसी दवाइयों से ठीक  हो जायेगा .ये एक कैंसर है जो बहुत ज्यादा फैल चूका है ,झोलाछाप डॉक्टर से इसका इलाज अब नहीं होने वाला .इसकी पूरी जाच करके और योजना बनाके इसको ओपरेट करना पड़ेगा .
बचपन से हमने सुना और पढ़ा है कि बल बुध्धि विवेक और धेर्य से हम सब प्राप्त कर सकते है ,क्या हमारे देश में ये है .हा भाई  सारी योग्यता है और प्रयोग कर भी रहे है ,विवेक और धेर्य का तो नहीं पता परन्तु बल और बुध्धि का प्रयोग तो हम एक दुसरे पर बहुत कर रहे है .

कोई आतंकवादी घटना जब घटती है जो हमारी जनता दुःख से भावुक हो जाती है करो या मरो का सन्देश देती है ,सत्ता धारी उचित कार्यवाही का आश्वासन देते है और विपक्षी सरकार  को सत्ता से हटाने की मांग करते है ,और ये हमेसा होता है बस सत्ता और विपक्ष्य बदलता रहता है जनता वही रहती  है .
परिपक्व होते लोकतान्त्रिक देश में शायद    जाने कैसे एक धारणा बन गई है की कुछ करो मत बस अपनी नाकामी दुसरे के सर डाल दो अपने को शांतिपिर्य देश बता कर अपनी कमजोरी को छुपा लो .
कभी कभी मन में विचार आता है की जाने कैसे हम अपने आप को बड़ा लोकतंत्र  ,विकाशशील,जिम्मेदार देश और शक्तिशाली समर्थ बताते है .शायद बाहर के देशो में ऐसा समझा जाता हो अच्छा है ,परन्तु मुझे ऐसा लगता है की हमारी गाड़ी अपने आप  चल रही है और ड्राईवर सो रहा है सब भगवान भरोसे जो होगा देख लेंगे की जगह  जो होगा भुगत लेंगे वाली भावना है .आलसी ,निक्कमेपन और चाटुकारिता की हद है .

साथियों अब हल्ला मचाके कुछ नहीं मिलेगा ,शांत होकर पहले अपने को  हर क्षेत्र में  योग्य बनाकर फिर निर्णय करने की जरूरत है ,अभी बहुत सी जमीनी हकीकत है जिन्हें हमें पहले पूरा करना है ,हमारे यहाँ कार्यवाही की बात सब करते है पर निर्णय लेने वाला कोई नहीं है और कोई लेगा भी तो सत्ता और विपक्ष्य पहले एक दुसरे पे हमला कर देंगे अरे भाई अगर इसने ऐसा  किया तो उनका सरकार बनाने का सपना टूट जायेगा .

सबसे पहले हमें अपनी तुलना अमेरिया या अन्य किसी से नहीं करनी चाहिए वो क्या है वो उनका विषय है वो बहुत दूर है ,और हमारी स्थिति अगल है आतंकवाद हमारे अन्दर और बाहर दोनों और से समान रूप से फैला हुआ है .हम अपने देश में निर्णय लेने की स्थिति में ही नहीं है बाहर का क्या करेंगे हमारी  जेलों में हमारे लोगो को मारने वाले ही हमारे मेहमान बने बैठे है तो दुसरो के मेहमानों का आप क्या कर लेंगे आप  मार सकते नहीं अगरपकड़ के लायेंगे तो एक बंगला और बनाना पड़ेगा मेहमानों के लिए और भाई सेवा में कुछ कमी रह गई तो हमारे मानवाधिकारवादी सड़क पे  लोटने लगेंगे इतना हल्ला मचायंगे की भाई न सो पावोगे न खा पाओगे .


आज जरूरत है की अपने को पहले देश के अन्दर मजबूत होकर सभीजनों  को विश्वास में लेके ऐसे कानून और संस्था का निर्माण करना चाहिए जो निर्णय ले सके और उसके लिए वो संसदीय परम्परा के अनुरूप स्वतंत्र हो.




Wednesday, May 4, 2011

कीमत क्या है !!!!!!!!!!!

लादेन मारा गया आतंकवाद से सहमती न रखने वाले सभी लोगो ने इसका स्वागत किया .
इंडिया के मीडिया को गरारे करने पड़े खबर को देते देते गले थक गए हमारे कुछ नेता तो 
अंतिम क्रिया का तरीका भी बताने लगे .कैसे मरा  कैसे मारा ऐसे बता रहे थे कि C I A ने 
इनके पैर पर सर रखकर आशीर्वाद लिया हो और इन्होने विजयी भव कह कर भेजा हो .
अपने नाखून साफ नहीं कर सकते दुसरे का सर धोने चले है .
अमेरिका ने अपने इस ऑपरेशन से सिर्फ और सिर्फ ये जता दिया कि उसके देश में एक आम 
आदमी की कीमत है .वो इन्सान को पैसे में नहीं गिनता ,पैसे को इन्सान के लिए गिनता है  
उसके   लिए वो कुछ भी कर सकता  है .कुछ बाते गलत भी है पर वो करता तो है ,
लादेन को मरने के कुछ घंटो के बाद भारत के तमाम मीडिया में राजनेता और नौकरशाह 
संसद से लेकर मुंबई हमलो के गुनाहगारो को पकड़ने मरने की बाते पानी पि पि कर गाने लगे 
हद है भाई अरे कोई इनको बताता क्यों नहीं आप अपनी जबान बंद रख कर कुछ कर भी सकते 
हो या नहीं ,अमेरिका ने उसे भी  नहीं बताया जिसके वहा वो छुपा था ,
ये तो ऐसे  लगता है की कोई करना ही नहीं चाहते और कोई सोच ले तो इतना हल्ला पहले मचा देते है बंदा पहले ही गायब .
खिसिया कर एक बात बोल देते है कि हम अमेरिका कि तरह नहीं कर सकते हम उतने पॉवर फुल नहीं है ,अमेरिका ने मना किया है क्या पॉवर फुल बनने से .अरे जितना ये लोग  इंडिया का पैसा 
दबा के बैठे है उतने में तो दो अमेरिका पल जायेंगे .
इनके लिए ये ही काफी है कि ये बोलते रहे मुफ्त के रायचंद बने रहे सब को राय देते रहे .और कभी 
किसी ने कुछ पूछ लिया तो कह देंगे हम अमेरिका कि तरह पॉवर फुल नहीं है.
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अमेरिका ने एक बात को सिद्ध किया कि अपनों के दिल में अपनों का दर्द होता है ,वो अपने देश के बराबर अपने नागरिक कि कीमत मानता है ,हमारा दुर्भाग्य  ही है कि किसको अपना कहे .